शिक्षा के क्षेत्र में मुस्लिम महिलाओं की भागीदारी

देखा जाए तो मुस्लिम महिलाएँ सामाजिक और आर्थिक रूप से इतनी बुरी हालत में है कि यह समाजिक और आर्थिक रूप से ओबीसी वर्ग से भी काफी पीछे और निचले स्तर पर आके खड़ी है। (https://hi.wikipedia.org )  इनकी गणना और भागीदारी का प्रतिशत बहुत ही निराशाजनक है। 

भारत में भारतीय संविधान के अनुसार प्राथमिक स्तर पर सबके लिए शिक्षा अनिवार्य रखी गई है। इसके बाद भी आज आज़ादी के ७० सालों के बाद भी मुस्लिम समाज की महिलाओं की हालत बेहद ख़राब है। भारत मे ५० प्रतिशत से भी कम मुस्लिम महिलाएँ जो शिक्षित है। (https://hi.wikipedia.org ) अगर आप दूसरे अल्पसंख्यक समाज की महिलाओं के सम तुलनात्मक करे तो यह आपको प्रतीक होगा कि ईसाई ७६ प्रतिशत, सिख ६४ प्रतिशत, बुद्धा ६२ प्रतिशत और जैन ९० प्रतिशत महिलाओं की शिक्षा को भागीदारी है साक्षर हैं । अखिल भारतीय आधार पर ६६ प्रतिशत मुस्लिम महिलाएँ जो निरक्षर हैं | अच्छी शिक्षा में मुस्लिम महिलाओं की हाज़री मात्रा ३.५६ प्रतिशत हैं जो की अनुसूचित जातियों के अनुपात ४.२५ प्रतिशत से भी काम हैं ।

कुल मुस्लिम महिलाओं में से लगभग ६० प्रतिशत ने कभी स्कूल में प्रवेश ही नहीं लिया| लगभग १७ प्रतिशत से काम मुस्लिम महिलाओं ने कभी आठ वर्ष की स्कूली शिक्षा पूरी की और १० प्रतिशत से भी काम ने उच्चतर माध्यमिक शिक्षा पूरी की, जो राष्ट्रीय औसत से बहुत ही काम और निराशाजनक है | पूरे देश में मुस्लिम महिलाओं के निरक्षरता का अनुपात ग्रामीण उत्तर भारत से काफी अधिक है | हरियाणा में अशिक्षा का स्तर बहुत ही व्यपाक है जबकि केरल और तमिलनाडु में बहुत ही बेहतर है |

इस्लाम धर्म में महिलाओं को तेजस्वी माना जाता है। लेकिन पुरूष दहेज के नाम पर इनके साथ अत्याचार  करता है।  भारत में मुस्लिम महिलाओं की आबादी ६२.४ लाख  से भी अधिक है | इन महिलाओं का जीवन ऐसा अंधकार भरा है कि उनके जीवन में धार्मिक भूमिका, वंश को आगे बढ़ाने की प्रक्रिया, पति और उसके परिवार की सेवा करने के अलावा कुछ भी नहीं है। उन्हे अशिक्षित रख कर शरीयत का डर दिखा कर और सामाजिक रूढ़िवादी सोच में डूबा कर सिर्फ और सिर्फ पति और पति के परिवार की सेवा करना, कई विवाह, तीन तलाक़, एक तरफा तलाक़ पर पुरुष का विशेष अधिकार जैसे वीभत्स जैसे दलदल में रख दिया गया है | मस्लिम समाज का एक बड़ा वर्ग और बड़े-बड़े धार्मिक गुरु तीन तलाक़ के विरोध में खड़े होकर एक सुर में अपने ध्वनि  का परचम लहराने लग जाते है। लेकिन आज भारतीय समाज में सबसे कम शिक्षित, वंचित और राजनीतक रूप से हाशिये में शामिल महिलाओं की बुरी हालत पर उनकी आवाज़ तक नहीं निकलती है।

ग्रामी और शहरी की मलिन बस्तियों से आज भी युवतियों को घर के भीतर रहने के लिऐ प्रोत्साहित किया जाता है | पहले उनके अपने परिवार वाले करते है और फिर बाद में उनके पति | यह एक विकट स्थिति है। जो मुस्लिम युवतियों को स्कूली शिक्षा से दूर रखने में कही ना कही बाधा उत्त्पन्न करती है | ग्रामीण भारत में अगर किसी मुस्लिम परिवार की सोच शिक्षा के लिए विकसित होती है। और अपनी लड़कियों को गाँव के पाठशाला में पढ़ने के लिऐ भेजते है, तो उसी समाज के अन्य लोग नीची दृष्टि से देखने लगते है। और ताने देते हैं कि अब हमारी लड़किया अन्य वर्ग और समाज के लड़कों के साथ बैठकर पढ़ेंगी, यह तो समाज में बुराई पैदा करेगी| और फिर लोग शरीयत का हवाला देना शुरू करते हैं। लेकिन उनको यह नहीं पता की हज़रात मुहम्मद सल्लाहो अलैहे वसल्लम ने हर मर्द और औरत के लिए शिक्षा अनिवार्य कहा है | उन्हों ने कहा है। कि अगर ज़रुरत पड़े तो चीन भी जाओ और शिक्षा प्राप्त करो | उन्होने तो लिंग विभेद नहीं किया, यह तो नहीं कहा की केवल पुरुष ही चीन जाएगे |

मानसिकता

मुस्लिम लड़कियों की शिक्षा में शामिल लोग मुस्लिम लड़कियों को दी जाने वाली शिक्षा में हमेशा भ्रमित और एकतरफा झुका हुआ रहे है | वो लोग दीनी तालीम बनाम दुनियावी तालीम के गन और दोषों के व्यख्यान में लग गए | उनकी यह दीनी बनाम दुनयावी तालीम की सनक ने लड़कियों का भविष्य अंधकार में  धकेल दिया |

मुस्लिम महिलाओं की यह अंधकार भरी हालातों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है | अब उनको महसूस होने लगा है की यह रूढ़िवादी पितृसत्तात्मक समाज उन्हे उनका हक़ नहीं दे रहा है और साथ में शादी के नाम पर बड़ी सी बारात लाना, तीन तलाक़, लड़के के लिए लड़की देखने के समय उससे धार्मिक क़ानून और कलमा पूछा जाना ( जो लड़कों से नहीं पूछा जाता है), नौकरी करने से वंचित रखना जैसी परम्पराएं उन्हे दासनुमा जीवन में बाँध रखा है | मुस्लिम महिलाएँ चाहती है कि आज ज्ञान का कुछ ऐसा रूप हो जो उन्हें अपने बेहतर जीवन को सशक्तिकरण बनाए |  

भारत में मुस्लिम महिलाओं को शिक्षा की ओर अग्रसर करने वाले समाज सुधारक

भारत की पहली मुस्लिम महिला शिक्षक फातिमा शेख का आज जन्मदिन है | फातिमा शेख ने लड़कियों खासकर दलित और मुस्लिम समुदाय की लड़कियों को शिक्षित करने में सन्‌ 1850 के दौर में अहम योगदान दिया था. हालांकि आज फातिमा शेख के कार्यों के बारे में बहुत जानकारी उपलब्ध नहीं है, लेकिन इस बात से सभी वाकिफ हैं कि फातिमा शेख ने दलित महिलाओं को शिक्षित करने का प्रयास करने वाली सावित्री बाई फुले और महात्मा ज्योतिबा फुले के साथ काम किया था और उन्हें भरपूर सहयोग दिया था |

जिस वक्त सावित्री बाई फुले ने दलितों के उत्थान के लिए लड़कियों को शिक्षित करने का काम शुरू किया था, उन्हें घर से निकाल दिया गया था, उस वक्त फुले दंपती को फातिमा शेख ने अपने घर में जगह दी थी | सावित्री फुले ने जब स्कूल खोला उस वक्त बच्चों को पढ़ाने के लिए शिक्षक नहीं मिल रहे थे, लेकिन फातिमा शेख ने उनकी मदद की और स्कूल में लड़कियों को पढ़ाया | उनके प्रयासों से ही मुस्लिम लड़कियां स्कूल जाने लगीं | फातिमा शेख को दलित-मुस्लिम एकता के सूत्रधारों में से एक माना जाता है |


परिचय:
मेरा नाम इशाद शेख है।
मैं टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोसिअल साइनस के एम- पॉवर ग्रंथालय अध्ययन केंद्र में प्रबंधक के रूप में कार्यरत हूँ। मैने हिंदी साहित्य में एम.ए किया है।

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