” मजदूर “

“मजदूर को करोना क्या मारेगा..
मजदूर को जीने की मजबूरी मार डालेगी..

             मानवीय शक्ति के द्वारा जिसमें शारीरिक बल, दिमागी कार्य और प्रयासों से जो कार्य किया जाता है उसे ही मजदूर  कहते हैं।

             हमारे देश के गरीब मजदूर के हालत से तो आप सभी वाकिफ ही होंगे. मजदुर की परिभाषा क्या है? दुःख, दरिद्रता, भूख, अभाव, कष्ट, मज़बूरी, शोषण और अथक परिश्रम- इन सबको मिला दें तो भारतीय मजदूर की तस्वीरें उभर कर आती हैं जो हमे लॉकडाउन में देखने को मिली है।

             दो वक़्त की रोटी और अपने परिवार का पालन पोषण करने के लिए कड़ी मेहनत करते हैं। देखा जाये तो अन्य लोगों के तुलना में सबसे ज्यादा काम मजदुर ही करते हैं लेकिन फिर भी बदले में उन्हें बहुत कम पैसे मिलते हैं। ये उनके साथ एक तरह का शोषण ही तो है जो उद्द्योगपति उनके साथ करते हैं।

             मजदूरों के साथ बहुत कार्यों में उनके साथ शोषण किया जाता है। किसान मजदूर को इतना आमदनी नहीं हो पाती की वो अपने जीवनशैली चला सके जिसकी वजह से वह शहर की तरफ रुख करता है और वह शहर में आकर छोटे-मोटे काम की तलाश करता है जिसकी वजह से उनके बच्चों की भी पढ़ाई बर्बाद होती है जिससे बच्चे ड्रॉप आउट हो जाते हैं यह भी उनके साथ बहुत बड़ी समस्या है। जिससे आगे चलकर वही बच्चे फिर से मजदूर बनते हैं।

             उन्नत देशों के मजदूर और भारत के मजदूर में जमीन आसमान का अंतर है। वहाँ के मजदुर सम्मानित हैं। भारत के मज़दूर के मुकाबले, उसके पास सुख साधनों की कमी नहीं है। उन्नत देशों में मजदूरी बहुत मेहेंगी है। वहां के देशों में लॉकडाउन के दौरान मजदूर ऐसे बाहर पैदल एक राज्य से दूसरे राज्य नहीं गए लेकिन हमारे देश के मजदूर एक राज्य से दूसरे राज्य पैदल निकल गए 1500 किलोमीटर से लेकर 2000 किलोमीटर पैदल पैदल चले गए जिसमें ना जाने हमारे मजदूर भाइयों की जान चली गई।

             इतना ही नहीं कारखानों और केंद्रीय सरकार के लिए काम कर रहे मजदूरों के बीच भी असामनता देखने को मिलती है। वर्ल्ड इकनोमिक फोरम द्वारा 2018 में प्रकाशित “ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट” बताती है की एक ही काम के लिए मजदूरी में असामनता के मामले में भारत 149 देशों में 72वें स्थान पर है। यह अंतर शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में लगातार देखा जा रहा है।

             फैक्ट्रियों में आज भी महिलाओं को पुरुषों के बारबार वेतन नहीं दिया जाता है। जबकी महिलाओं और पुरुषों का काम एक ही होता है फिर भी उनमे वेतन को लेकर असामनता देखने को मिलती है।

             हमारे सरकार को महिला श्रमिक से संबंधित कानूनों को सख्ती से लागू करना चाहिए जिससे की महिलाओं को उनका हक़ मिले और अगर कोई इन कानूनों का उल्लंघन करे तो उसके खिलाफ कड़ी कार्यवाही करनी चाहिए तभी जाकर मजदूरों के हालात सुधर पाएंगे।

             अपने घर की आर्थिक स्थिति को ठीक करने लिए मजदूर मज़बूरी में अपने बच्चों से भी बाल मजदूरी करवाते हैं। जो उम्र उनके पढने लिखने की होती है उस उम्र में उन्हें मजदूरी के दलदल में धकेल दिया जाता है।

             बाल मजदूरी बच्चों के मानसिक, शारीरिक, आत्मिक, बौद्धिक एवं सामाजिक हितों को प्रभावित करती है जिससे उनका मासूम सा बचपन उनसे छीन जाता है। भारतीय संविधान के मौलिक अधिकारों में शोषण और अन्याय के विरुद्ध अनुच्छेद 23 और 24 को रखा गया है। अनुच्छेद 23 के अंतर्गत खतरनाक उद्योगों में बच्चों के रोजगार पर प्रतिबंध लगाया गया है। अनुच्छेद 24 के अंतर्गत 14 साल के कम उम्र का कोई भी बच्चा किसी फैक्ट्री या खदान में काम करने के लिए नियुक्त नहीं किया जायेगा और न ही किसी अन्य खतरनाक नियोजन में नियुक्त किया जायेगा।

             जो मजदूर अपने हाथों से शहर बसाता है बाद में उन्हीं मजदूरों को वहां से भगा दिया जाता है। इसलिए जो अमीर है वह अमीर होता जाता है जो गरीब हो गरीब होता चला जाता है हमारे देश में दो भारत बन गए हैं अमीर एक गरीब।

             मजदूरों को रोटी, कपड़ा, माकन दिलाने के लिए अभी लम्बा रास्ता तय करना है। उनके लिए आवाज उठाना बहुत जरूरी है क्योंकि हमारे देश के साथ अगर कुछ भी होता है चाहे करोना  में लॉकडाउन। चाहे दंगा हो इत्यादि कठिनाइयां देश में आती है तो सबसे ज्यादा मजदूरों पर असर पड़ता है तो उनके लिए हमें आवाज उठाना बहुत जरूरी है।

” धन्यवाद”


परिचय:
मेरा नाम अफसर है मै मुंबई में रहता हूं । मै नई सोच सामाजिक संस्था का फाउंडर हूं ।जो ड्रॉपआउट बच्चो , बस्तियों के प्रॉब्लम, और उनके स्किल साथ काम करते है। और लोगो को जागृत भी करते है उनके काम के प्रति जिससे लोग अपने खुद का काम कर सके।

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