मजदूर हैँ मजबूर ??

मजदूर हैँ मजबूर??
खुद से पहले सोचता वो अपने परिवार के लिए।
10_12 घंटे काम करता वो अपने घर के अमन और मुस्कान के लिए ।
वो अपना घर छोड़ देता हैं कमाने के लिए।
वो मजदूर ही होता है जमाने के लिए ।

जिस दिन मनाते है सब छुट्टी उसके नाम पर,
उस दिन भी तैयार होती है वो कमाने के लिए ।
ज्यादा धन_दौलत नहीं चाहिए होती उसे,
बस कमाता हैं दो वक़्त की रोटी अपने परिवार को खिलाने के लिए।  
कियू मजदूर मजबूर होता है जमाने के लिए?

वो सड़क बनाता है पर रास्ता मुश्किल होता है उसकी ज़िंदगी के लिए ।
पैरों में आ जाते ह छाले अक्सर ,इस दुनिया को दो हाथों से चलाने के लिए।
नजर अंदाज कर देता है बीमारी, जैसे आराम बना ही ना हो उसके लिए ।
पैरों के छाले अक्सर नहीं दिखाता वह अपने घर वालों से छुपाने के लिए।
कियू मजदूर मजबूर होता है जमाने के लिए?

वो सुबह वक़्त से पहले जाता,शाम को वक़्त पर घर आने के लिए।
अपने परिवार को अक्सर वक़्त नहीं दे पाता, अपने काम का वक़्त बढ़ाने के लिए।
मजदूरी कर के अपने घर की सारी ज़रूरतें करता है पूरी।
काम करते_करते थक जाता ह,पर झेब खाली होती है इज्जत के खज़ाने के लिए।
कियू मजदूर मजबूर होता है जमाने के लिए?

वो दूसरों का घर बनाता अपना घर चलाने के लिए ।
वो पथर में तरासता भगवान को,
भगवान को नजर आने के लिए।
चुप चुका ह सबकी नाज़रो से मजदूर।
और आज हम मौजूद ह मजदूर दिवस बनाने के लिए।
क्यूं मजदूर मजबूर है जमाने के लिए?

– Salma Khan


Introduction:
Mera naam Salma hai.
Mein Mankhurd Mandala mein rehti hu.
Mujhe poem likhna bohot pasand hai.

First published in Aisa Bharat Banayenge

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